देश में दुखते मन-रिसते घाव के साथ प्रवासियों का पलायन जारी

हिमांशु राय ( स्‍वतंत्र पत्रकार )

आज न तो किसी राजनीतिक मुद्दे पर चर्चा होगी ना किसी दुनियादारी की बात होगी। बीते दो माह से कुछ ऐसी तस्वीरें आंखों के सामने लगातार तैर रही हैं, जिसने मेरी कलम को उठने पर मजबूर कर दिया। इन तस्वीरों के साथ तमाम ऐसी खबरें भी जो देख और पढ़ हर किसी के दिलो-दिमाग में खौफ भर जाता है। कोरोना वायरस ने लोगों की रातों की नींद उड़ा दी है।

इस वैश्विक महामारी के शिकार लोगों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। रक्तबीज की तरह एक देश से दूसरे देश और एक शहर से दूसरे शहर और गांव में यह गुणित अनुपात में फैल आतंक का पर्याय बन चुका है। ऐसा आतंक, जिसका न किसी के पास इलाज है और ना ही इसे रोकने का कोई कारगर उपाय। कहां गए बड़ी-बड़ी हांकने वाले? आज चारों तरफ ये देखने को मिल रहा है कि जो लोग अपना घर छोड़कर प्रदेश में बसे हैं और मेहनत करके अपना पेट पाल रहे हैं

उनको इस समाज ने मजदूर शब्द से संबोधित कर दिया है। खैर ये शब्द बुरा नहीं है, लेकिन इस शब्द की आड़ में उन मेहनत करने वाले भाइयों को ये समाज, ये प्रशासन, ये वर्दी वाले लोग जिस नजरिए से देख रहे हैं वो बुरा है। मैंने कई जगह पढ़ा कि मजदूरों को पुलिस ने लाठी भांज कर भगाया, पैदल चलकर एक लंबी दूरी तय करके घर पहुंचे मजदूर। क्या मजदूर होना कोई गुनाह है क्या? क्या मजदूर और एक कार में चलने वाले लोगों के शरीर में और चमड़े में अंतर होता है? फिर इन मजदूरों को इंसान क्यों नहीं समझा जाता है। लोग ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे वो बेबस लोग नाली से निकल कर आ रहे हैं।

बहुत शर्म की बात है कि लोगों के नजरिए कितने गंदे हो गए हैं। आज जिन मजदूर भाइयों की मौत हो रही है उनका गुनाह सिर्फ इतना था कि वो घर से कोसों दूर जाकर ईमानदारी से दिनभर मेहनत करके दो वक्त की रोटी खा रहे थे। खैर इसका दर्द एसी की हवा खाने वाले रईस लोग क्या समझेंगे। उनकी पैंट की क्रीज खराब नहीं होनी चाहिए, बाकी भाड़ में जाए दुनियादारी। यदि कोसों दूर चलकर अपने घर पहुंच रहे इन बेबस लोगों को इंसान समझा जाता तो शायद इनको इतना दुख नहीं झेलना पड़ता।

इस लॉकडाउन ने वाकई फरेबी चेहरों से पर्दा उठा दिया है। कई ऐसे सांसद और विधायक दिखे जो चुनाव के वक्त दौड़कर चाची और बहिनी करते नजर आते थे, लेकिन जब हालात बदले तो कन्नी काटकर कहीं बोरे में छिप गए। जो लोग अपने घरों को छोड़कर बाहर कमा रहे हैं और बॉस की गाली सुनकर किसी तरह दो वक्त की रोटी खा रहे हैं क्या कभी किसी ने उनका दर्द पूछा है? आज का ट्रेंड चला है कि एक समय के बाद मां-बाप भी यही बोलते हैं कि जाकर बाहर कुछ काम करो नहीं तो घर छोड़कर निकल जाओ। मैं कहता हूं कि यदि इसी तर्ज पर चलना है तो औलाद पैदा ही मत करिए।

इस बात का प्रमाण लॉकडाउन में कोसों दूर पैदल चलकर अपने घर पहुंच रहे इन श्रमिक भाइयों से बात करने पर पता चलता है। न जाने कितने लोग ऐसे टकराए जो बस यही बोलते नजर आ रहे थे कि साहब क्या करें यदि काम पर नहीं जाता तो घर पर ताने सुनने पड़ते थे। जब कई लोगों से इस तरह के शब्द सुनने को मिले तो सच मानिए जनाब, इंसान तो छोड़ ही दीजिए इंसानियत से ही भरोसा उठ गया।

मुझे गर्व है ऐसे लोगों पर जो मेहनत से बाहर काम करके दो वक्त का राशन जुटाते हैं क्योंकि उन पर कोई एहसान नहीं कर रहा है। वो खुद की बदौलत खाते हैं और खुद की बदौलत जीते हैं। यदि कायदे से देखा जाए तो चाहे सरकार का नौकर हो या प्राइवेट कर्मचारी हो या फिर दिहाड़ी वेतन पर काम करने वाले लोग हों हम सभी एक मजदूर ही हैं। सिर्फ वर्दी, कोट या टाई लगा लेने से आप मजदूर की श्रेणी से बाहर नहीं हो जाएंगे। जिनको आप मजदूर बोलकर नीचा या तुच्छ समझते हैं।

दरअसल, ये सभी लोग मेहनत नहीं करते तो खुद को राजा समझने वाले लोग भी भिखारी बन जाते। जो लोग इन मेहनत करने वालों को नीची नजरों से देखते हैं दरअसल वही ऐसे लोग हैं जो कूपमंडुक की तरह एक सीमित क्षेत्र में टर्र-टर्र करते हैं। लेकिन, जब 10 लोगों के बीच खड़े हो जाते हैं तो बोलती बंद हो जाती है। क्योंकि उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में सिर्फ लोगों का मजाक ही उड़ाया है। शायद इसीलिए मजाक बनकर खड़े रह जाते हैं। अपनी सोच को बदलिए और लोगों का सम्मान करना सीखिए। यदि इतना भी नहीं कर सकते हैं तो अपना मुंह बंद रखिए, इसी में भलाई है।

पुलिस प्रशासन लोगों पर लॉकडाउन का सख्ती से पालन करवाने के नाम पर जोर-जोर से लाठियां चला रहा है। ऐसा लगता है जैसे मार खाने वाले लोग इंसान नहीं हैं। अभी इस बात को खुले तौर पर कहिए तो लोग कहेंगे कि यदि प्रशासन और पुलिस लाठी चला रही है तो वो उन लोगों की सुरक्षा के लिए ही चला रही है। ताकि वो कहीं इस बीमारी से मर न जाएं। मैं कहता हूं कि जब आप लाठी चलाकर ही उसे मार दोगे तो कोरोना क्या खाक मारेगा। कई ऐसे पुलिस कर्मी हैं

जो इन बेबस श्रमिकों को सहायता प्रदान कर रहे हैं। लेकिन, कई ऐसे भी पुलिसकर्मी हैं जो इस लॉकडाउन में भी नौकरी करने का क्रोध इंसानों पर हैवानों की तरह लाठी चलाकर निकाल रहे हैं। जब लोगों से इसका जिक्र किया जाता है कि मजदूरों को पीटा जा रहा है तो वो भी बोल उठते हैं कि जब नियम का पालन नहीं होगा तो पुलिस डंडा तो चलाएगी ही।

वो इसलिए बोलते हैं क्योंकि इन लाचार लोगों की मुश्किलों का अंदाजा नहीं होता। अरे नियम का पालन तो तब होगा न जब सवेरे शाम इन भूखे लोगों तक भोजन पहुंचा दिया जाए। इंसान अपने शरीर को जरूर नियमों की हथकड़ी में बांध सकता है, लेकिन पापी पेट को नहीं।

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