विकास दुबे नहीं, अपराधी और राजनीति के गठजोड़ का एनकाउंटर जरूरी

मुकुंद मिश्र ( वरिष्ठ पत्रकार )

उत्तर प्रदेश के कानपुर से करीब पौने सात सौ किलोमीटर दूर स्थित महाकाल के सामने हाजिरी लगाने के बाद जिस तरह से विकास दुबे की कथित गिरफ्तारी हुई, उसके बाद से ही सूबाई आपराधिक परिदृश्य से राष्ट्रीय फलक पर चर्चा का सबब बने ​विकास दुबे की परिणति को लेकर कयास लगाये जाने लगे। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर तमाम पोस्ट वायरल होती दिखीं, जिनमें किसी मसाला फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह यूपी पुलिस की पटकथा की ओर इशारा किया जा रहा था।

विकास दुबे को लाने के लिए चार्टर्ड प्लेन भेजे जाने की खबर पर चुटकी लेते हुए लिखा गया कि प्लेन रास्ते में क्रैश होगा और इसमें सवार यूपी पुलिस के अधिकारी आदि पैराशूट के साथ सवार होंगे। कहा जायेगा कि विकास दुबे हादसे में मारा गया। वहीं चार्टर्ड प्लेन के बाद जैसे ही यह खबर लहरायी कि यूपी पुलिस विकास दुबे को सड़क मार्ग से लेकर रवाना हुई है। इस खबर को लेकर एक सज्जन ने अपनी पोस्ट में लिखा कि रास्ते में टायर फटने से गाड़ी पलटी और विकास दुबे पुलिस की पिस्टल छीनकर भागा और एनकाउंटर में मारा गया।

दरअसल, ये महज चुटकियां नहीं थी, बल्कि फिल्मी अंदाज में होने वाले एनकाउंटर की कमोबेश यही स्क्रिप्ट रही है। चाहे फिर वह यूपी पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज हों या फिर मध्य प्रदेश और तेलंगाना पुलिस के। लेकिन, चर्चा का विषय महज यह रटी-रटायी और लिखी-लिखायी स्क्रिप्ट नहीं। ना ही यह कि ऐसे किसी दुस्सा​हसिक अपराधी को इस तरह ढेर किया जाना। चर्चा के साथ चिंता का विषय इसके पीछे की मजबूरी है, जो एक सिस्टम को ऐसा करने के लिए विवश कर देती है।

तेलंगाना पुलिस ने दिसंबर, 2019 में एक वेटरनरी डॉक्टर दिशा के साथ दरिंदगी करने वालों को ढेर किया था। यहां भी एनकाउंटर की स्क्रिप्ट वैसी ही थी जैसी आमतौर पर होती है। दरअसल, जिस जघन्यता के साथ दिशा के साथ रेप करने के बाद उसे जिंदा जला दिया गया था, उससे यह मामला देश भर में चर्चा का सबब बन गया था। लोगों के आंदोलन आदि को लेकर दबाव में आई और वरंगल में ऐसे ही किस्म के आराधियों से निपटने की करीब 11 वर्ष पुरानी स्क्रिप्ट को पुलिस ने फिर से दोहराने का फैसला किया।

डॉ. दिशा के साथ दरिंदगी करने वालों को मौका-ए- वारदात पर निशानदेही के लिए ले जाया गया, जहां उन्होंने पुलिस के हथियार छीनकर टीम पर हमला किया और जवाबी कार्रवाई में दरिंदे मारे गये। इसके बाद लगातार सरकार पर हमलावर विपक्ष शांत, जनता खुश और यह कारनामा अंजाम देने वाली पुलिस पर फूलों की बारिश।

कुछ दिन पहले मिशन एनकाउंटर चलाने वाली यूपी पुलिस ने कइयों को मार गिराया। विकास दुबे के मारे जाने के कुछ ही घंटों में यूपी पुलिस ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक और शातिर का एनकाउंटर किया। यदि विकास दुबे से यूपी पुलिस के एनकाउंटर अभियान की बात करें तो यहां किसी अपराधी को उसकी परिणति तक पहुंचाने का उद्देश्य कम, बल्कि सरकार पर लगने वाले दागों को धोने की कशमकश ज्यादा रही है।

अगर ऐसा नहीं है तो यूपी में मिशन एनकाउंटर के बाद भी आखिर गोरखपुर का पन्नालाल यादव और कानपुर के बिकरू का रहने वाला विकास दुबे कैसे बचा रहा? सीओ सहित आठ पुलिसकर्मियों को मारने वाला विकास यूपी पुलिस के लिए हिस्ट्रीशीटर कैसे बन गया? जबकि कुछ दिन पहले तक इसी पुलिस के अधिकारी उसे पोषित- पल्लवित करने में जुटे हुए थे।

यहां तक जिस वक्त उसे अरेस्ट करने के लिए सीओ सहित पुलिस टीम गांव बिकरू गई तो उसकी सूचना भी उसे थाने से पहुंचा दी गई। यहां यह गौर करने की भी बात है कि इस पोषण और पल्लवन में बाधा बने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की हत्या करा उसे रास्ते से हटाने का भी खेल रचा गया। यदि ऐसा नहीं है तो चौबेपुर थाने का एसएचओ दबिश देने गई टीम में पीछे क्यों था?

विकास दुबे जैसे अपराधियों को पोषित करने वाले एसएचओ विनय तिवारी का हौसला यूं ही नहीं बढ़ा होगा कि वह पद की संवैधानिक शपथ को ताक पर रख अपने सिस्टम के ही दुश्मन को सपोर्ट करे। विकास दुबे की हिस्ट्रीशीट के साथ उसके अदने से इलाकाई कद पर नजर डालें तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है। कई आपराधिक रिकॉर्ड रखने वाले विकास दुबे के खिलाफ 90 के दशक में हत्या का पहला मामला दर्ज हुआ। मगर, वह अदालत से बरी हो गया।

इसके बाद वर्ष उसके हौसले इतने बढ़ गये कि वर्ष 2001 में प्रदेश सरकार के राज्यमंत्री को थाने के अंदर हत्या करने से वह जरा भी नहीं हिचका। हाल के दिनों की ही तरह ​क्षेत्रीय दबंगई से प्रदेश के आपराधिक फलक पर विकास दुबे का नाम उस समय चमका, यहां चमकना लिखना इसलिए भी जायज है कि इस हत्याकांड में वह बाइज्जत बरी हुआ। जिस वक्त उसने एक मंत्री की हत्या की, वहां तमाम पुलिसकर्मी मौजूद थे।

लेकिन, अदालती बयानों में सबके सब चुप थे या फिर विकास दुबे को बचाने वाली भाषा बोलते रहे। आखिर ऐसा क्यों, सत्ता से लेकर सिस्टम तक को चुनौती देने वाले अपराधी को बचाने की आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी, जो सभी ने देखकर अनदेखा कर दिया। उस समय के सत्ताधारी दल से लेकर विपक्ष तक में समय-समय पर हैसियत हासिल करने वाला बिकरू का यह दबंग, सूबे की सियासत और आला अधिकारियों तक की पहुंच रखने वाला विकास दुबे बन गया। उनकी यह भाषा और सत्ताधारियों तक पहुंच से वह खुद में भविष्य का एक बाहुबली नेता का अक्स देखने लगा। देसी- विदेशी हथियार, यहां तक एके 47 भी उसके जखीरे में शामिल रहीं।

करीब 60 आपराधिक मामलों में आरोपित रह चुके विकास दुबे पर उस समय भगवा रंग भी चढ़ा जब बीएसपी और सपा के रसूखदार नेताओं ने भाजपाई दामन थामा। उसके दामन पर भी लगे सारे दाग इन नेताओं से करीबी और सत्ता के आचमन से धुलते रहे। यहां यह बताना भी जरूरी है कि जिस प्रदेश के एक मंत्री की हत्या हो, वहां की अगली सरकार हत्यारे को सजा दिलाने में दिलचस्पी तक नहीं दिखाती।

अदालती फैसले को सरकार ने चुनौती तक नहीं दी। यानी एक अपराधी को बगैर उच्च अदालत तक सजा दिलाने का प्रयास करने के बजाये उसे अभयदान देने में ज्यादा सियासी समझारी महसूस की। अब सत्ता अपना फायदा देख रही हो तो बहती गंगा में सिस्टम भी अपना हित क्यों न साधे?

अपराधी और राजनीति के इस गठजोड़ ने न जाने कितने विकास दुबे को जन्म दिया और मजबूरी में उनका एनकाउंटर किया गया। विवशता इस बात की भी कि कहीं वह पकड़ा गया और उसने जुबान खोली तो न जाने कितनों के दामन पर आंच आएगी। क्योंकि ​बिकरू के विकास दुबे की कहानी में सूबे की सियासत पर राज करने वाली पार्टियों के नायकों के पीछे छिपे खलनायक का चेहरा सामने होता।

सिर्फ सियासी रसूखदार ही क्यों? इनकी आड़ में खुद भी हित साधने वाले अधिकारियों की जमात भी नंगी हो जाती। फिर क्या, एक राहें हीर और एक राहें फत्ते…वाली तर्ज पर विकास दुबे जैसों के एनकाउंटर की स्क्रिप्ट निकाली जाती है और उसे शूट कर लोगों के बीच अक्सर पेश की जाती है। यहां सिर्फ एक विकास दुबे की बात नहीं है, असल एनकाउंटर जरूरी है अपराध और राजनीति के गठजोड़ का। क्योंकि विकास जैसे फलों को निशाना बनाने की बजाय उस पेड़ व उसकी जड़ों को उखाड़ना होगा, ताकि फिर कोई और विकास फले-फूले नहीं।

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