राजनीतिक चश्मा लगा लड़ रहे कोरोना की जंग !

मुकुंद मिश्र ( वरिष्ठ पत्रकार )

कोरोना से उपजे हालात से निपटने के लिए उठाये जा रहे कदमों को लेकर यह साफ आभास होता है कि या तो वह कंफ्यूजन में हैं या फिर सरकार इसे अंडर इस्टीमेट कर देख रही है। शुरूआती दौर में जब कोरोना के चंद मामले थे तो उसने उसने पूरे देश को लॉकडाउन कर लोगों को घरों में कैद कर दिया। वहीं जब उसकी भयावहता का आंकड़ा सवा लाख पार कर चुका है तो सब खोल दिया गया।

जिस समय लोगों को घर पहुंचाना था तो उस समय ट्रेन, बस के पहिये जाम कर उन्हें जहां हैं, वहीं रहें कहकर रोका गया। जब रोकना चाहिए तो उन्हें घर भेजने के साधन उपलब्ध कराये जा रहे हैं। दरअसल, इन दोनों पहलुओं पर नजर डालें तो सरकार के इन फैसलों में कोरोना के डर से उठाये गये कदमों से ज्यादा राजनीतिक नफे-नुकसान का खौफ ज्यादा झलकता है।

क्या वाकई में कोरोना की जंग को भी सत्ताहित के लिए राजनीतिक चश्मा लगाकर लड़ी जा रही है। इसके लिए भारतीय सरहदों के पार भी नजर दौड़ानी जरूरी है। गौर करें तो अमेरिका में जहां राष्ट्रपति चुनाव हैं और अमेरिकी प्रेसीडेंट एक बार फिर मैदान मारने के चक्कर में चीन पर लगातार दबाव बना रहे हैं।

कोरोना महामारी के पहले से जो उनका एजेंडा चल रहा था, वह बदस्तूर जारी है। बस फर्क इतना है कि उस समय चीन के साथ आर्थिक एवं व्यापारिक युद्ध था तो अब कोरोना की जंग। ट्रंप के एजेंडे में कोई बदलाव नहीं आया है।

खैर, यह बात दुनिया के सबसे ताकतवर करार दिये जाने वाले देश की रही। अब जरा विश्व गुरु बनने का सपना देखने वाले भारत के प्रधान सेवक और उनकी सरकार की भी कर लें। देश में कोरोना संक्रमण ने तबाही मचा रखी है। लोगों की जान के साथ ही अर्थव्यवस्था को भी तहस-नहस कर दिया है। न जाने कितने लोगों की नौकरी चली गई। न जाने कितने लोग ऐसे हैं जो भुखमरी का शिकार हो गए।

तमाम लोग ऐसे भी हैं जिनके पास खुद के लिए जहर खरीदने के पैसे भी नहीं बचे। तमाम लोग ऐसे हैं जो बीमारी होने के बावजूद इस विषम परिस्थिति में अपना इलाज भी नहीं करा सकते हैं।

लॉकडाउन से डेढ महीने तक ठप हुए उद्योग-धंधों की वजह से लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गृह राज्य जाने को मजबूर हैं। देश के किसी भी हाइवे पर निकल जाएं तो वहां पिछले डेढ़ माह से शुरू हुए प्रवासी श्रमिकों के पलायन के दर्द से उठ रही कराह आपका कलेजा चीरकर रख देगी। यह स्याह मंजर उससे भी ज्यादा हृदय विदारक है, जो विभाजन के समय लोगों ने देखा था। फर्क बस इतना है कि उस समय दो देशों के बीच पलायन था। लेकिन, इस बार अपने ही देश में मजबूरी की गठरी सिर पर रख लोग पलायन करने को मजबूर दिखे।

इन दृश्यों और दर्द की कराह के बीच वे शब्द भी कान में गूंजते हैं, जिसमें देश के प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन की घोषणा के समय कहे थे। जहां हैं, वहीं रहें और जान है तो जहान है, जान भी जहान भी और तीन माह का राशन लोगों के लिए सरकार के पास है, कोई नियोक्ता अपने कर्मचारियों को नहीं निकालेगा, लॉकडाउन में मकान के किराया न लिया जाये…न जाने क्या-क्या। लेकिन, कोरोना संकट से देश को बचाने के लिए सरकार ने जो राहत पैकेज घोषित किया, उसमें उद्योगों को बचाने की सिर्फ फिक्र थी।

अर्थव्यवस्था को बस किसी तरह पटरी पर लाने की कवायद थी। 20 लाख करोड़ के पैकेज में गरीब-मजदूरों के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं थी। मध्यम वर्ग को राहत के नाम पर महज मोरेटोरियम मिला। मतलब कि उसे लंबित किस्तों का बाद में देने का झुनझुना। वह झुनझुना, जिसमें मीठे सुरों की जगह अतिरिक्त ब्याज के जरिये ठगे जाने का दर्द ज्यादा था। राहत पैकेज में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने आत्मनिर्भरता भारत का बखान किया, लेकिन देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले मजदूरों की आत्मा को छलनी करने का काम किया गया।

सबसे अहम पहलु इस कोरोना संकट और उससे निपटने की सरकार की कोशिशों का यह भी है कि सरकार इस आपदा काल में भी सियासत करती दिखी। तीन तलाक, धारा 370, सीएए-एनआरसी, तबलीगी जैसे मुद्दों को लेकर नाराज कौम को साधने का प्रयास किया। नवरात्रि, रामनवमी, वैशाखी, गुडफ्राइडे जैसे विभिन्न धर्मों के पर्वों पर भी लॉकडाउन के मामले में जरा भी मुरव्वत न करने वाली सरकार ने रमजान के आते ही ढील दे दी। मानो जैसे सरकार ने कोरोना से जंग में जीत की खुशी में तोहफा दिया हो।

ईद से पहले तो देश के सारे बाजार गुलजार हो गये। लेकिन, दूसरी ओर कोरोना के आंकड़े डरा रहे हैं। संक्रमितों का आंकड़ा सवा लाख पार हो चुका है और प्रतिदिन सामने आने वाले नये मामलों की संख्या नित इतिहास रच रही है। अगस्त तक मौतों का आंकड़ा 34 हजार पहुंचने का अनुमान है, जबकि अभी महज 37 सौ के आसपास है। फिर सरकार ने यह फैसला क्यों लिया? दरअसल, यह प्रयास इसलिए भी जरूरी था कि शुरूआत में इन्हीं मुद्दों पर भारतीयों को दो ध्रुवों में बांटकर एक बड़े वर्ग की पार्टी बनने का, वह टूट चुका था।

लॉकडाउन में गरीबों-मजदूरों-मध्यम वर्ग को रोजी रोटी के सवाल ने धर्म-जाति से उपर उठा दिया। उसके मन में सिर्फ और सिर्फ सत्ता और शोषित वर्ग के बीच सदियों से कायम रहे छत्तीस के आंकड़े ने फिर से जन्म लेना शुरू कर दिया है। यह सरकार भी भांप गई है, ऐसे में उसे अब फिर मौजूदा सरकार को अपने कथित राष्ट्रीय एजेंडे को ताक पर रख सबका साथ सबका विकास पर लौटने को मजबूर दिया है। लौटना भी जरूरी था क्योंकि आने वाले समय में मजदूरों व मध्यम वर्ग के गढ़ प.बंगाल और प्रवासी मजदूरों की जमात करार दिये जाने वाले बिहार में विधानसभा चुनाव जो हैं।

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है )

डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Samvad News उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार Samvad News के नहीं हैं, तथा Samvad News उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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