दम तोड़ती स्वास्थ्य सेवाएं।

संवाद न्यूज़ ब्यूरो

जनता की आवाज़ (वर्णिता बाजपेयी)

जिंदगी के साथ होता ऐसा खिलवाड़ हिंदुस्तान के अच्छे दिनों के लिए एक बड़ा कांटा है।

हाल ही में मैक्स और फोर्टिस जैसे बड़े अस्पतालों में जो घटनाएं हुई वो भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को सवालों के घेरे में खड़ा करती हैं। इससे पहले गोरखपुर के बी.आर.डी अस्पताल में ऑक्सीजन कि पूर्ति रुकने के चलते एक दिन में 30 बच्चों की मौत का मामला भी सामने आया था। ये सभी मामले भारत की स्वास्थ्य सेवाओं के डूबते हालात पर मुहर लगाते हैं। ऐसी घटनाओं को सुनने समझने के बाद आपको किसी भी तथ्य या किसी मंत्री कि बयानबाजी सुनने कि तनिक भी आवश्यकता नहीं। देश में घटती ऐसी घटनाएं स्वास्थ्य व्यवस्था की जर्जर हालत का प्रमाण ख़ुद-ब-ख़ुद देती हैं। समूचे देश का स्वास्थ्य विभाग मानो स्ट्रेचर पर आ गया हो। गोरखपुर के अस्पताल में एक दिन में हुई 30 बच्चों की मौत 30 बच्चों की मौत नहीं, वो मौत थी 30 परिवारों की। इससे पहले की बात करें तो 2012 में भी गोरखपुर में ही 3000 बच्चों की मौत हो चुकी है। जो देश के स्वास्थ्य व्यवस्था का मिज़ाज बख़ूबी दर्शाता है। इसी साल कि घटना है कि लखनऊ के लोहिया अस्पताल के पोस्टमार्टम कक्ष में एक महिला का शव आवारा कुत्ते द्वारा बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया,जो कि हमारे ज़ेहन में ख़ौफ़ पैदा करने के लिए काफ़ी था। उत्तरप्रदेश ही नहीं झारखंड के महात्मा गांधी मेडिकल में भी कुपोषण के चलते 52 बच्चों की मौत का मामला सामने आया था।

देश मे प्रतिवर्ष बच्चों के प्रसव के दौरान भी बड़ी मात्रा में महिलाएं जिंदगी से हाथ धो बैठती हैं। प्रसव के दौरान होती इन मौतों का मामला लगातार बढ़ता जा रहा है। मध्यप्रदेश,उत्तरप्रदेश,राजस्थान में जहाँ ये आंकड़ा प्रतिवर्ष 310 से 340 का है, तो वहीं झारखंड,छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में 180 का है। भारत सरकार कि वार्षिक हेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत के 9 राज्य जिनमें राजस्थान,उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश भी शामिल हैं वहां शिशु और मातृ मृत्यु दर की स्थिति बहुत गंभीर है। मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में शिशु मृत्यु दर 67 से 70 के बीच है तो उत्तराखंड,झारखंड जैसे राज्यों में 41 से 43 के बीच। कैग की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में पिछले 5 सालों में तकरीबन 93.7 लाख गर्भवती महिलाओं ने प्रसव पूर्व देखभाल के लिए अपना पंजीकरण कराया था। पर प्रसव सिर्फ 69.8 लाख महिलाओं का हुआ। तो अब प्रश्न ये है कि बाकी की 23.9 लाख महिलाओं का क्या हुआ? भारत मे हर साल 5 लाख रोगी इलाज में बरती लापरवाही के चलते मौत की गोद में चले जाते हैं। देश की राजधानी दिल्ली में जहाँ फोर्टिस अस्पताल में बच्ची की मौत के बाद लगभग 15/16 लाख का लंबा बिल बना दिया जाता है तो वहीं मैक्स अस्पताल ने जिंदा बच्चे को मृत घोषित कर दिया। ये लापरवाही नहीं है तो आख़िर है क्या। इस बात को हम नकार नहीं सकते कि एक तरफ़ हमारे देश के स्वास्थ्य विभाग स्ट्रेचर पर हैं तो वहीं स्वास्थ्य के रखवाले व्हीलचेयर पर। गोरखपुर में 30 बच्चे एक दिन में मर जाते हैं तो अब अगर पूरे हिंदुस्तान पर नज़र घुमाई जाए तो ना जाने अस्पतालों में गंदगी और लापरवाही के चलते हर रोज़ कितनी जाने जाती होंगी। कैग ने गुजरात के 3 जिला अस्पतालों की जब जाँच कि तो पाया कि वहां ऑपरेशन थिएटर तो हैं पर ऑपरेशन के बाद मरीज़ को रखने के लिए कमरा नहीं है। वहीं 5 जिला अस्पतालों में 32 स्पेशल ट्रीटमेंट सुविधाओं में सभी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। उत्तरप्रदेश के बस्ती जिले की बात करें तो अस्पताल में इन दिनों मरीज़ों के साथ-साथ आवारा कुत्ते भी अस्पताल परिसर में रह रहे हैं। इसके अलावा डॉक्टर के बजाय फार्मासिस्ट और नर्स प्रसव पीड़ित महिलाओं का ईलाज कर रही हैं। वहीं प्रदेश के कुछ जिलों की हालत इतनी बद्दतर है कि कुछ आई.सी यू वार्ड में बिलजी तक नहीं है और मरीजों का ईलाज ठेलों पर किया जाता है।

भारत जैसे देश में आख़िर स्वास्थ्य सेवाओं की ऐसी दुर्दशा क्यों हैं? जिस देश के प्रधानमंत्री लालकिले पर खड़े होकर स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत की बाते करते हैं क्या उन्हें इस बात से अब अवगत कराना पड़ेगा कि जिस देश का संचालन वो कर रहे हैं उसकी असल समस्या क्या है। या वो सबकुछ जानकर भी देखना नहीं चाहते। नेता और अधिकारी इन बातों पर लड़ते रहते हैं। एक दूसरे पर आरोप मढ़ते रहते हैं और सवाल पूछने पर उनका रटा-रटाया जवाब तैयार रहता है कि ‘व्यवस्था को सुधारने की कोशिश की जा रही है’। हम मान भी लेते हैं कि कोशिशें लगातार की जा रही हैं पर अधिकारियों द्वारा की गई ये कोशिश कभी तो नज़र आनी चाहिए। बस ऐसे में सरकार के स्वास्थ्य पर किए गए सभी दावे धराशाही हो जाते हैं। स्वास्थ्य के नाम पर होती राजनीति जहां हमारे जीवन के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। तो वहीं इस देश में डॉक्टरों की कमी भी स्वास्थ्य व्यवस्था के दम तोड़ने का एक प्रमुख कारण है। उत्तरप्रदेश की बात करें तो 254 सरकारी अस्पतालों में सर्जन तो हैं पर एनेस्थीसिया विषेषज्ञ नहीं। प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 3,195 पद हैं परंतु 1,063 पद पर ही डॉक्टर उपलब्ध हैं। वही राजस्थान में कुल 1528 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 1755 डॉक्टर हैं तो महाराष्ट्र में 1811 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 2,760 । विश्व स्वास्थ्य संगठन के आधार पर प्रति हज़ार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन भारत में 1674 की आबादी पर एक डॉक्टर है। हमारे देश में डॉक्टर की स्थिति वियतनाम और पाकिस्तान जैसे देशों से भी बद्दतर है।

जहां एक ओर भारत महाशक्ति बनने की तैयारी कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर इस देश की चिकित्सा सुविधाओं की बदनुमा तसवीर कहीं और ईशारा करती है। अगर ऐसा ही चलता रहा और देश की चिकित्सा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए सख़्त कदम नहीं उठाए गए तो देश का महाशक्ति बनना तो दूर देश गर्त में ज़रूर चला जाएगा। और अगर स्वास्थ्य व्यवस्था कि ओर ध्यान ना दिया गया तो जिस तरह ओडिशा के कालाहांडी के दाना मांझी अपनी पत्नी का शव उठाकर चले थे ठीक उसी तरह एक दिन भारत की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था पूरे हिंदुस्तान की लाश ढो कर यात्रा करने को मजबूर होंगी।(Pic by-Social Media)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *