जननी को ही जीने का हक़ नहीं, न अपनों से सुरक्षित हैं और न अपने जैसों से

      संवाद स्पेशल (वर्णिता वाजपेयी)

 

16 दिसंबर 2012 राजधानी दिल्ली के इतिहास कि वो मनहूस तारीख़ जिसने पूरी दिल्ली को शर्मसार कर दिया। समूचे हिंदुस्तान के सामने ये सवाल खड़ा कर दिया कि वो जननी जो सबको जीवन देती है उसे जीने का अधिकार क्यों नहीं है। पांच साल पहले चलती बस में निर्भया के साथ जो अमानवीय कृत्य हुआ वो कोई पहली घटना नहीं थी, जिसने समाज के ज़हन में खौफ़ पैदा करने का काम किया हो। 2012 से पहले भी तमाम ऐसे मामले फाइलों में धूल फांक रहे हैं। निर्भया कांड के बाद दिल्ली में उतरे जनसैलाब और न्याय व्यवस्था के खिलाफ़ अविश्वास व नफ़रत देखकर तो यूँ लगा था कि न्याय व्यवस्था सुधरेगी और महिलाओं के प्रति ऐसे अपराधों में कमी आएगी। पर ऐसा होता दिखाई तो क्या कहीं सुनाई तक नहीं दे रहा। हाल ही में हिसार में जो घटना हुई वो हमारे समाज पर चोट करती हैं। जब एक पांच साल की बच्ची एक सोती हुई माँ के पास से अगवा कर बलात्कारियों के हाथों मार दी जाती है तो इस समाज के नीचे गिरने का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं।
तो वहीं शिमला में जब एक 12 वर्ष का लड़का 5 वर्षीय लड़की के साथ दुष्कर्म करता है तो पांच साल पहले हुआ वो आंदोलन पाखण्ड लगता है। ऐसी घटना सुनने के बाद 2012 में निर्भया के लिए न्याय मांगता वो जन सैलाब, कानून के प्रति अविश्वास और आक्रोश दिखाता वो जन सैलाब सब दिखावा से प्रतीत होता है। कहने को भारत महान है,होगा भी पर आज के दौर में मुझे ये कहते हुए ज़रा भी संकोच नहीं कि ऐसे लोगों के रहते मेरा भारत कभी महान नहीं बन सकता। नन्ही बच्चियों के साथ होता ऐसा जघन्य अपराध हमें तिल-तिल मारता है। आज हर रोज़ एक निर्भया किसी कि हवस के चलते अपनी अस्मिता गवा रही है।

वो नन्ही बच्चियां जिन्हें सही मायने में अस्मिता का अर्थ तक ज्ञात नहीं वो कुछ असामाजिक तत्वों के चलते उसे खो बैठती हैं। अब सुरक्षा क्या होती है हम भूल चुके हैं। सुरक्षा कहीं नहीं है न अपनो से और न अपने जैसों से। कुछ महसूस होता है तो सिर्फ़ डर। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थाने में पंजीकृत होते हैं। इसके अलावा भारत में प्रत्येक घण्टे 4 महिलाएं बलात्कारियों के हाथों अपनी अस्मिता गवा देती हैं। लेकिन ये आंकड़े भी कहानी पूरी बयां नहीं करते क्योंकि बहुत सारे मामले ऐसे हैं जिनकी रिपोर्ट ही दर्ज नहीं हो पाती। 2011 में देशभर में बलात्कार के कुल 7,112 मामले सामने आए थे। महिला सुरक्षा से जुड़े तमाम कानून और बहसों के बावजूद भी ऐसे अपराध कम नहीं हो रहे। 2015 में 34,651 महिलाओं के साथ बलात्कार होने कि घटनाएं सामने आई। वहीं अगर महिला अपराध के मामलों पर नज़र डालें तो राजधानी में हर रोज़ क़रीब 48 महिलाएं किसी न किसी अपराध कि घटना का शिकार होती हैं। 2017 में दिल्ली में दुष्कर्म के 1,894 मामले थाने में दर्ज हुए, छेड़छाड़ के 3,044,अश्लील इशारों के 578,दहेज हत्या के 112 तो वहीं अपहरण के 3,420 मामले दर्ज किए गए। ये सभी आंकड़े इस बात कि पुष्टि करने के लिए काफ़ी हैं कि महिला सुरक्षा को लेकर पुलिस कि तमाम घोषणाएं, अभियान सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित हैं।

निर्भया कांड के बात बलात्कार जैसे मामलों में सज़ा के लिए कानून में संशोधन किए गए। ऐसा नहीं है कि न्याय व्यवस्था और पुलिस प्रशासन महिलाओं को न्याय दिलाने में हमेशा नाक़ाम रहता है। वर्तमान में बिलकिस बानो और निर्भया जैसे मामले इस बात का साक्ष्य भी हैं। पर ऐसे कई मामले हैं जिनमें महिलाएं देश के न्यायालय से न्याय नहीं पा सकीं हैं। कुछ मामले दर्ज नहीं होते, तो कुछ स्त्रियां न्याय की गुहार लगाते लगाते दम तोड़ देती हैं। ढेरों मामले पुलिस थाने में बस पंजीकृत होकर ही रह जाते हैं। बलात्कार जैसी घटनाओं के पीछे एक कुंठित मानसिकता है। नारी की अस्मिता छीन कर उसे जीते जी मारना घटिया और निकृष्ट सोच का ही नतीजा है, जिसे रोकने के लिए सिर्फ़ सख़्त कानून नहीं बल्कि सोच बदलने की भी आवश्यकता है। बलात्कार जैसी घटना के बाद नारी ख़ुद में ही मर जाती है। वो ख़ुद की नज़रों में गिर जाती है। वो कृत्य भले ही कुछ क्षण का हो पर उसकी सज़ा वो जीवन भर भोगती है। एक जननी जो जीवन प्रदान करती है वो आज के दौर में हर रोज़ मारी जा रही है,कहीं शरीर से तो कहीं आत्मा से। वो घटना जिसने अदालत से लेकर संसद तक को जनता की पीड़ा सुनने के लिए बाध्य कर दिया वही जनता आज अपनी मानसिकता बदल नहीं पा रही। हम बात तो करते हैं महिला शशक्तिकरण कि,बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की पर महिला शशक्तिकरण के लिए महिलाओं का जीवित रहना भी ज़रूरी है। बेटी बचेंगी तभी तो पढ़ेंगी। उस मानसिकता को अब बदलना होगा जो लड़कियों को भोग कि एक वस्तु मात्र समझते हैं। हर मां को अपनी बेटी के साथ -साथ दूसरे की बच्ची की इज़्ज़त करनीभी सीखनी होगी। हर स्त्री को अपनी लड़ाई अब ख़ुद बुलन्द आवाज़ में लड़नी होगी। हर जननी को आगे आना होगा ताकि फ़िर कभी कोई द्रौपदी भरी सभा में किसी कि विकृत मानसिकता का शिकार न बने।
****
क्यों खिलवाड़ करती है ये दुनिया
मेरी अस्मिता के साथ
हर बार; बार-बार
और फ़िर एक बार
क्या हक़ नहीं मुझे भी
जिंदगी बेखौफ़ जीने का
क्यों अपने हक़ की सांसें
किसी और से मांगू उधार ****

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *