सभ्यता और संस्कृति को दरकिनार कर रहे बच्चे

संवाद न्यूज (गायत्री पांडे)
क्या हमारी सभ्यता और संस्कृति धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है? क्या आज कल के बच्चे संस्कार नाम से ही दूर भाग रहे हैं। आने वाला कल इन बच्चों का कैसा होगा इसका तो पता नहीं लेकिन इससे ये अनुमान लगाया जा सकता है कि जो बच्चे आज के समय में WhatsApp, Facebook मैसेंजर जैसी चीजें यूज कर रहे हैं।  सोशल मीडिया पर ऑनलाइन दिखते हैं लेकिन ये बात इन बच्चों के दिलों दिमाग पर जरा भी चोट नहीं करती और न तो ये बच्चे समझ रहे हैं कि उनका फ्यूचर कैसा होगा? क्या इसमें माता पिता की भी गलती है? आखिर क्यों इतने गलत रास्ते पर बढ़ते जा रहे हैं बच्चे।
कहा जाता है कि सोशल मीडिया या इंटरनेट बहुत अच्छी चीज है लेकिन आज की जनरेशन पर इसका बहुत बुरा असर दिख रहा है। जो कि आने वाले कल में  बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। यही फेसबुकिया बच्चे आगे चलकर जब किसी काम के नहीं रह जाते हैं तो सारा दोष मां-बाप के सिर मढ़ देते हैं। लेकिन मां-बाप भी इन बच्चों को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। जरा दिमाग पर जोर डालीए और सोचीए कि जब एक बच्चा एकदम छोटा होता है और गाली देता है तो मां बाप को कितना अच्छा लगता है।
वो सबसे बताते भी हैं कि अरे मेरा छोटू आज पड़ोसी को गाली दे रहा था लेकिन जरा सोचीए कि जब वही बच्चा बड़ा होकर गाली देता है तो अंजाम क्या होता है? ठीक उसी तरह कहीं ऐसा न हो जाए कि ये बच्चे बड़े होकर सिर्फ फेसबुक ही चलाने के काबिल रह जाएं और बाकी कामों में बाबाजी।  जहां पुराने समय को देखा जाए तो बच्चे अपने परिवार के साथ ज्यादा समय बिताते थे और उन्हें परिवार के लोगों से लगाव भी रहता था लेकिन आज के समय में यह बच्चे खुद को एक कमरे में बंद रखते हैं।
उन्हें अगर गलती से दादी,  मम्मी, पापा कुछ बोलते हैं तो इन फेसबुकिया बच्चों को बहुत बुरा लगता है। इतना ही नहीं जनाब अगर उन्हें गलती से भी बोल दिया जाए कि पढ़ाई करो घूमो मत फालतू काम मत करो तो यह सब बातें उन्हें बहुत बुरी लगती हैं और पलटकर उसका जवाब भी दे देते हैं। लेकिन यह नहीं सोचते हैं कि यह उनके ही  भलाई के लिए बोला जा रहा है ना कि जो लोग बोल रहे हैं उसमे उनकी भलाई है।
इस तरह से अगर उन्हें कोई कह दे कि आज कहीं जाना है या पूजा पाठ वगैरह करना है तो बोलते हैं यह सब चीजें फालतू होती हैं क्या इसमें अपना समय बर्बाद करें। इस तरह से ये बच्चे सबसे दूर रहते हैं और उसके बावजूद ये अपेक्षा करते हैं कि उनके जरूरत कि वस्तु  उपलब्ध होनी चाहिए। अगर नहीं उपलब्ध करवाई गई तो अपने माता पिता को परेशान करेंगे  उनपर दबाव बनाएंगे।
इस प्रकार इन बच्चों का जीवन जहरभरा होता जा रहा है। जो कि अपनी सभ्यता संस्कृति से इतनी दूर होते जा रहे हैं। जिन्हें यह नहीं समझ में आता है कि यह हमारे पूर्वजों के बनाए हुए रीति रिवाज हैं, परंपरा और  संस्कृति है। उनको इसका पालन करना चाहिए आने वाले समय में यह बच्चे देश का भविष्य तो नहीं बन सकते हैं क्योंकि इन्हें जितनी सुख सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं उसका का यह लोग दुरुपयोग कर रहे हैं। उन्हें यह नहीं करना चाहिए आज समय अच्छा है अगर नहीं समझ सकते हैं तो आने वाले कल में कोई इन्हें  समझाने वाला नहीं रहेगा ।

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