” बिना पढ़ाई और खेल के बच्चों का विकास कैसे संभव “

जनता की आवाज़ (महेश तिवारी )

 

गांधीजी के विचारों के मुताबिक शिक्षा का अर्थ बालक और मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क और आत्मा में पाए जाने वाले सर्वोत्तम गुणों का चहुंमुखी विकास करना था। जिसे आम बोलचाल की भाषा में समझा जा सकता है, कि शिक्षा वह होती है, जो बच्चों के सर्वांगीण विकास यानि शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक गुणों को विकसित करने का काम करती हो। ऐसे में अगर बच्चों के लिए खेलने के लिए स्कूल में मैदान न हो, पढ़ने के लिए किताब न हो, पढ़ाने के लिए अध्यापक न हो, और पीने के लिए पानी मयस्सर न हो सके। फ़िर बच्चों का सरकारी व्यवस्था किस तरीके से मानसिक और शारीरिक विकास सरकारी शिक्षा के नाम पर कर रहीं है, यह समझना कोई टेढ़ी खीर नहीं। गांधी के शिक्षा दर्शन का एक उद्देश्य यह भी था, कि 7 से 14 वर्ष के बच्चों को निNशुल्क शिक्षा दी जाए, और शिक्षा ऐसी हो, कि रोजगार सृजन का साधन बन सके। ऐसे में अगर लगभग 9 हज़ार पद पटवारी का निकलता है, उसके लिए मध्यप्रदेश सूबे में 10 लाख लोग परीक्षा देते हैं, तो यह समझा जा सकता है, आज के दौर में शिक्षा की गुणवत्ता क्या और कैसी उपलब्ध कराई जा रहीं है। हां एक बात जरूर गांधी जी के शिक्षा दर्शन से तुलनात्मक अध्ययन के रूप में आज के दौर में देखी जा सकती है, कि देश ही नहीं प्रदेशों में भी शिक्षा के अधिकार के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है, लेकिन उसकी जमीनी हकीकत क्या है, वह किसी से छिपी नहीं है।

मध्यप्रदेश सूबे के बच्चों का यह दुर्भाग्य है, कि संविधान के अनुच्छेद 21 (क ) के तहत जो निशुल्क शिक्षा उनका संवैधानिक अधिकार है, उससे वंचित नज़र आते हैं। अगर सूबे की सरकार नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की शर्तें पूरी नहीं कर पाई है, तो यह सूबे के बच्चों के अधिकारों से खिलवाड़ करने से कम नहीं है। शायद यहीं स्थिति पूरे देश की भी हो सकती है। इसके साथ देश में शिक्षा तंत्र की क्या स्थिति है, वह किसी से छिपा नहीं है। शिक्षकों की कमी, पाठ्यक्रमों में नवीनता की कमी और आधारभूत संरचना की कमी की वजह से देश की शिक्षा व्यवस्था तार-तार होकर अपने वर्तमान पर रो रही है। ऐसी ही कुछ शिक्षा को लेकर तस्वीर मध्यप्रदेश की भी उभरती है। जिसे उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। शिक्षा का बजट बढ़ जाता है, नित-नई सरकारी योजना का एलान शिक्षा में सुधार को लेकर होता है, लेकिन शिक्षा का स्तर है, कि सुधरने का नाम नहीं लेता। ऐसा नहीं शासन द्वारा सुधार की कोशिश नहीं हो रही। मध्यप्रदेश शासन मिल बांचे योजना, ज्ञानपुंज योजना आदि चलाती है। पर सूबे की शिक्षा व्यवस्था पर शायद किसी की नज़र लग गई है,

कि उसमें सुधार दिखता नहीं। बल्कि योजनाओं में ही खोट निकल आता है। अब सरकार ज्ञानपुंज योजना के असफल रहने के बाद मोबाइल टीचिंग योजना पर ज़ोर देने जा रहीं है। जिसके तहत सप्ताह में दो दिन बाहरी शिक्षक आकर खराब प्रदर्शन वाले स्कूलों के खेवनहार बनेंगे। इस योजना की सफलता तो बच्चों के परीक्षा परिणाम तय करेंगे, लेकिन सरकार शिक्षकों की नियमित भर्ती और बुनियादी सुविधाओं की तऱफ झांकती नही। यह चिंता का विषय है। जो पूरे देश की सूरतेहाल बयां करती है। पूरे देश के भीतर यूडीआईएसई की रिपोर्ट के मुताबिक 97923 प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में मात्र एक शिक्षक है, और देश भर में शिक्षकों का अकाल होने के बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था शिक्षकों की भर्ती नहीं करा पा रहा है। इसके साथ इस सूची में मध्यप्रदेश 18190 शिक्षकों की कमी के साथ पहले स्थान पर है। फ़िर शिक्षा का अधिकार बच्चों को दिलाने के लिए कितनी फिक्रमंद है, इसका सहज आंकलन किया जा सकता है। जब शिक्षा के अधिकार कानून के तहत 30 से 35 छात्रों एक शिक्षक होना चाहिए। ऐसे में अगर देश में बनिस्बत शिक्षकों की संख्या भी पूरी नहीं की जा रही। फ़िर देश में शिक्षा की क्या स्थिति है, यह किसी से छिपा नहीं।

बिना पढ़ाई और खेल के बच्चों का विकास कैसे संभव “

स्कूल में सुविधाओं की बात करें, तो मध्यप्रदेश सूबे के अगर 44 हजार 754 स्कूलों में खेल के मैदान तक नहीं हैं। और प्रदेश सरकार जब स्कूलों में खेल गतिविधियां अनिवार्य कर चुकी है। फ़िर बच्चे खेलेंगे कहाँ, औऱ खेलेंगे नहीं तो उनका शारीरिक विकास होगा कैसे, ये कुछ चुनिंदा सवाल है जिनका उत्तर शासन व्यवस्था को ढूढना होगा। कैग की रिपोर्ट ने मध्यप्रदेश सरकार को शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त झोल की हकीकत से रूबरू कराने का कार्य किया है, जिस पर सरकार को बच्चों के भविष्य को देखते हुए गौर करना चाहिए। इसके साथ पूरे देश को इससे सीख लेने की जरूरत है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के 5 हजार 176 सरकारी स्कूलों में पानी की सुविधा तक नहीं है। फ़िर ऐसे में सरकारी स्कूल के नाम पर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है, यह कहना उचित लगता है, जिसमें सरकारी व्यवस्था भी मूकदर्शक साबित हो रही है। अगर बच्चों को पीने के लिए पानी तक घर से लाना पड़े, फ़िर शिक्षा के नाम पर भारी भरकम बजट का होता क्या है, यह समझ से परे है। इसके अलावा सात हजार 180 स्कूलों में छात्रों और पांच हजार 945 स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय अगर रिपोर्ट के मुताबिक हैं नहीं, फ़िर स्त्री सशक्तिकरण की बातें सियासी फ़रेब से ज्यादा कुछ समझ में आती नहीं।

बीते 30 नवंबर को मध्यप्रदेश विधानसभा में पेश हुई रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में एक लाख 14 हजार 255 सरकारी प्राइमरी और मिडिल स्कूल हैं। फ़िर देश में एक अप्रैल 2010 से लागू आरटीई कानून का कोई मतलब समझ मे आता नहीं, क्योंकि व्यवस्था तो रेंग अपनी चाल से ही रही है। फ़िर वह मध्यप्रदेश सूबा हो या अन्य कोई राज्य। शिक्षा क्षेत्र की स्थिति ठीक कहीं भी दिखती नही। आरटीई कानून में ज़िक्र है, कि कानून लागू होने के बाद तीन वर्ष के भीतर सभी राज्यों को इसके मापदंड पूरे करने होंगे, लेकिन मध्यप्रदेश सरकार अगर कुछ विशेष इस दिशा में कर पाई नहीं। तो साफ़ संकेत यही है, कि बच्चों की शिक्षा और अधिकार को लेकर सरकार की इच्छाशक्ति और मनोबल कमजोर है। रिपोर्ट में बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल ख़ड़े किए गए हैं। सवाल जायज भी हैं। जब स्कूलों में बाउंड्रीवाल तक है, नहीं। फ़िर सूबे के 53 हजार 345 सरकारी स्कूल वर्तमान हालात में बच्चों के लिए सुरक्षित कहाँ से हो सकते हैं? मध्यप्रदेश में बच्चों के अपहरण की घटनाएं भी सुर्खियां बनती है, फ़िर भी सरकार और प्रशासन की नींद न खुलना चिंता की बात है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार सूबे के लगभग 11 हज़ार स्कूलों में पुस्तकालय जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ 64 हजार के करीब प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में प्रधानाध्यापक के लिए अलग से कक्ष नहीं हैं। इसके साथ कुछ राज्य ऐसे भी हैं, जहाँ एक ही कक्षा में दो-चार क्लासेस एकसाथ चलती हैं। फिर यह हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था की मलिन हालत है। अब जब कैग ने मध्यप्रदेश सूबे के सरकारी स्कूलों की वर्तमान स्थिति को लेकर सख़्त और तीखी टिप्पणी की है। तो क्या कुछ बदलाव देखने को मिलेगा, या अभावों में ही हमारे देश के भावी कर्णधार ऐसे ही तैयार होते रहेंगे?

अगर मध्यप्रदेश के मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कक्षा आठ के 2.9 फ़ीसद नौनिहाल अक्षर तक नहीं पढ़ पाते, तो यह जगजाहिर करता हैं, कि सूबे ने कृषि, पर्यटन, और अन्य क्षेत्रों में कितने ही मील अन्य राज्यों से आगे निकल गया हो, लेकिन शिक्षा जो जीवन को आधार प्रदान करती हैं, उस कड़ी में सूबा काफी पिछड़ चुका हैं। ऐसे में बोर्ड परीक्षा में अच्छे परिणाम की उम्मीद करना भी हाथ पर सरसों के पौधे उगाने से कम नहीं। आज भी देश में तमाम आयोग और कानून के बाद 28.7 करोड़ लोग अशिक्षित है। तो क्या अब शिक्षा को लेकर कोई सकारात्मक क्रांति समाज में देखने को मिलेगी। या बने बनाए ढ़र्रे पर सब कुछ चलता रहेगा। और राजनीति अपने जाति, धर्म के बल पर चुनाव जीतकर इतराती रहेगी।

जब नॉर्वे 6.5 फ़ीसद, इजरायल 6.5 फ़ीसद, क्यूबा 12.6 फ़ीसद और उत्तर कोरिया जैसा देश अगर शिक्षा पर 6.2 फ़ीसद जीडीपी का हिस्सा ख़र्च करता है। फ़िर हमारे देश में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने का विचार कब आएगा। जब 20 फ़ीसद शिक्षक ही एनसीटीई के मानक पर खरे नहीं उतरते औऱ शिक्षण संस्थान की हालत पतली है, फ़िर प्रतिभाओं का कुंद पड़ जाना देश में स्वाभाविक है। जिसका उदाहरण मध्यप्रदेश की स्कूली शिक्षा से देखा जा सकता है। स्‍कूली शिक्षा की तस्वीर मध्‍यप्रदेश ही नहीं लगभग पूरे देश में बेहतर नजर नहीं आती। जिसका उल्लेख यू-डाईस की वर्ष 2013-14 की रिपोर्ट से भी पता चलता हैं, जिसके अनुसार जहाँ एक ओर शासकीय स्‍कूलों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, वहीं दूसरी ओर इस दिशा में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के पांच वर्षों बाद भी हालात अच्‍छे नहीं दिख रहे हैं। उक्त रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश सूबे में 5,295 स्‍कूलों में उस वक्त तक एक भी शिक्षक नहीं थे। जिसमें सरकारी स्‍कूलों की संख्‍या 4,662 थी। फ़िर कल्पना की जा सकती है, कि बिना साधन के साध्य को कैसे साधा जा सकता है। तो क्यों न नीतियों में बदलाव और प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति की जाए, जिससे शिक्षा स्तर में कुछ सुधार दिख सकें। साथ में बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास का वाहक भी सरकारी स्कूल बन सकें।

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