क्या मैं देशभक्त हूँ ? – दीक्षा राय

    संवाद स्पेशल (दीक्षा राय)

समस्त भारतवासियों को मेरी तरफ से गणतंत्र दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ । भारत माता की जय। जय हिंद, जय भारत।

                                                           

खूब बहती हैं अमन की गंगा बहने दो,
मत फैलाओ देश में दंगा रहने दो,
लाल हरे रंग में ना बाटो हमको,
मेरे छत पर एक तिरंगा रहने दो.

 

सबकुछ एकसाथ बोलने का मकसद मेरा ये था कि मेरी याद्द़ाश्त जरा कमजोर है। बातों-बातों में याद रहे न रहे। वैसे भी अगर भारत माता की जय करती फिरूँगी तो लोग मुझे पागल ही समझेंगे। देशभक्ति की बातें भला रोज-रोज थोड़ी अच्छी लगती हैं। जी नहीं, ये मैं नहीं कह रही बल्कि ये लाईनें तो मुझे मेरे समाज ने दी हैं। अभी पिछले साल गणतंत्र दिवस के दो रोज बाद की घटना है। मैं बाजार में सब्जियों कि दुकान पर खड़ी थी। तभी उधर से एक बच्चा हाथों में तिरंगा लिए ‘भारत माता की जय’ बोलता हुआ भागा। मेरे पास खड़ी एक महिला ने कहा, “ये देखो, अभी इनका गणतंत्र दिवस जारी है।”

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सब्जी वाले भईया ने बोला, “अरे नहीं मैडम, वो पागल है, हमेशा ऐसे ही करता है।” मेरे मन में उस बच्चे के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। मैंने पूछा, “लेकिन भईया, ये पागलपन देशभक्ति का ही क्यों ?” फिर पता चला की उस बच्चे के पिताजी सीमा पर लड़ते हुए शहीद हो चुके थे। पिता की मौत का उसे ऐसा सदमा लगा कि अब उसे बदले के सिवा कुछ नजर नहीं आता और रह-रहकर ‘भारत माता की जय’ बोलता है। सब तो उसे पागल समझकर भूल गए लेकिन उस बच्चे ने मुझे अपनी ही नजरों में गिरने पर मजबूर कर दिया। किसी भी माँ के लिए इससे बड़ा दर्द भला और क्या होगा कि उसे अपने बच्चों से “माँ” शब्द सुनने के लिए किसी खास दिन का इंतजार करना पड़े। वो पागल मेरी नजरों मे अब पूजनीय था।

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यदि आप मेरी बातों से सहमत नहीं है तो जरा पूछिए अपने दिल पर हाथ रखकर की आज से पहले वो कितनी बार धड़का है अपने देश के लिए? कितनी बार याद किया सरहद पर शहीद होनेवाले देश के रखवालों को? जो संकल्प आप आज अपने भाषणों में बढ़ा-चढ़ाकर ले रहे हैं वो आज से पहले क्यों नहीं लिया? देश की याद आज ही क्यों आई? ये ‘भारत माता की जय’ आज ही क्यों? तिरंगे के सामने राष्ट्रगान सुना कर देशवासी होने का फर्ज तो अदा कर दिया मगर जो आजतक अदा नहीं कर पाए उस कर्ज का क्या? आज ‘भारत माता की जय’ तो कह दिया लेकिन क्या ये देशभक्ति कल सुबह रहेगी? ये जोश, ये जुनून और देश के लिए मर मिटने वाली बातों की “वैलिडिटी” कितनी है जनाब? ये मत भूलिए की आप भी उसी समाज का चेहरा हैं जहाँ हर देशभक्त को पागल कहा जाता है। तो जरा पूछिए अपने आप से कि क्या आप भी एक सच्चे देशभक्त हैं? यदि हाँ, तो आज से खुद को पागल समझ लिजिए, और यदि नहीं तो ‘भारत माता की जय’ करने का आपको कोई अधिकार नहीं।

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किसी को हिंदू होने पर गर्व है तो कोई खुद को मुसलमान कहकर अकड़ रहा है। कोई जरा इन्हें याद तो दिलाओ कि जिस गीता और कुरान की जंग इन्होंने छेड़ रखी है वो पढ़ने के लिए बने हैं, लड़ने के लिए नहीं। धर्म के पुजारियों, जरा ये भी याद करो कि एक रोटी की उम्मीद में सड़क पर बैठे हुए भिखारी का कोई मजहब नहीं होता। उसके लिए तो न गीता भली, न कुरान बुरा। क्योंकि ये दोनों उसके पेट में लगी भूख की आग को शांत नहीं कर सकते। यदि अपने घर या अपनी माँ पर मुसीबत आ जाए तो हम मौत से लड़ जाते हैं । मगर उस घर का क्या जो हम सबका है? उस माँ के दर्द को कौन समझेगा? जरूरी नहीं कि जब बेटा सरहद पर अपनी जान देता है, माँ को तभी दर्द होता है। उसके बच्चे जो आपस में लड़ रहे हैं उसे देखकर तो भारत माता का कलेजा पीड़ा से फट रहा होगा। इतिहास गवाह है कि बच्चों की लड़ाई में सबसे अधिक तकलीफ और नुकसान सिर्फ माँ को हुआ है। क्योंकि उसकी ममता और प्यार बच्चों के स्वार्थ के बोझ तले दब जाते हैं। वो अपनी आँखों से सबकुछ बिखरते हुए देखती है मगर उसके हाथ बँधे होते हैं। आखिर उठाए भी तो किसपर? दोनों तो उसका ही अंश हैं। दुनिया की नजरों में तो वो खुशहाल होती है लेकिन अंदर से खोखली हो जाती है। कुछ ऐसा ही हाल हमारी भारत माता का है।

कोई सड़कों पर सरेआम लड़की की इज्ज़त का तमाशा बनाता है तो कोई तमाशबीन बनकर देखता है। किसी को बेटी नहीं चाहिए तो उसे जन्म लेने से पहले ही मार दिया और किसी बेटी की कोठे पर कीमत लगाई जाती है। राह चलते लड़कियों के साथ छेड़छाड़ होती है मगर वाह रे! देश की तकदीर..लोग सड़कों पर उतरते भी हैं तो भारत के इतिहास के साथ हुई छेड़छाड़ के विरोध में। मगर देश का इतिहास जो तुम लिख रहे हो वो किस काली किताब में छुपाओगे? मेरे पढ़े-लिखे देशवासियों, ये भारत माता के आँचल में लगा वो जिद्दी दाग है जो सिर्फ आपकी सोच के ‘डिटर्जेंट’ से ही साफ होगा। दाग तो जाने से रहा मगर इतना घिसकर ये आँचल कब तक सलामत रहेगा इसका जवाब सिर्फ आपके पास है।

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हिंदुस्तानी हैं तो जरा एक नजर अपने देश की तस्वीर पर डालिए। एक तस्वीर दो हिस्सों में बँट चुकी है। इसका एक हिस्सा तो त्याग और बलिदान से भरपूर खुबसूरती की मिशाल है। मगर दूसरा हिस्सा इस कदर रंगहीन हो चुका है कि अब सिर्फ एक कुशल चित्रकार ही उसमें रंग भर सकता है। मगर अफसोस की बात तो ये है कि हम वो कुशल चित्रकार कभी नहीं बन पाते। हमारा समाज कुछ ऐसा है कि हमारे विचार हमारी सोच तक ही सीमित रह जाते हैं। हमारी बातों में तो बहुत दम होता है मगर हाथों में ताकत नहीं होती। क्योंकि अपने हाथ हम लालच और स्वार्थ की जंजीरों से बाँध लेते हैं। हमारी आँखें सिर्फ इतना ही देखती हैं उसके बाद अंधी हो जाती हैं। हम अपने घरों को महल बनाना चाहते हैं लेकिन इस स्वर्ग जैसे घर को जीने लायक भी नहीं छोड़ते। हर कदम पर दहशत और खौफ ने इस मुश्किल जिंदगी को नामुमकिन सा बना दिया है।

माना कि भारत हमारा देश है और यहाँ की हवाओं पर भी हमारा अधिकार है। लेकिन हमारा कर्तव्य अधिकार जताना नहीं बल्कि देश की रक्षा करना है। तिरंगे को फैशन बनाकर पहनने से क्या ये अच्छा नहीं कि हम तिरंगे के रंगों को अपनी नसों में बहने वाले लाल रंग से मिला लें? क्या हमारा मन सफेद रंग की तरह साफ और निश्छल नहीं हो सकता? क्या हमारे जीवन में केसरिया और हरे रंग का कोई अर्थ नहीं? आखिर कब तक जियेंगे हम इस “आज मैं देशभक्त हूँ” वाली सोच में? क्या हमारी देशभक्ति इतनी छोटी है कि उसकी उम्र सिर्फ एक दिन है? यदि आप भी अपनी देशभक्ति तिरंगे के पास छोड़ आए हैं तो अभी भी वक्त है, जाकर उठा लिजिए उसे। क्योंकि ये वक्त आपस में लड़ने का नहीं बल्कि ऐसी बुराईयों से लडऩे का है जो इंसानियत को आहत करतीं हैं।

एक लेखक या लेखिका के कंधों पर समाज निर्देशन की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। मगर मैं अपने इंसान होने पर बहुत शर्मिंदा हूँ। माना की मैंने कुछ बुरा नहीं किया तो फिर इंसान बनकर आ सकती हूँ धरती पर, मगर क्या वो धरती हिंदुस्तान की होगी? देशभक्ति की बातें तो कर दी मैंने मगर अब मेरा दिल मुझसे ये पूछ रहा है की “क्या मैं देशभक्त हूँ?”

किसी को लगता हैं हिन्दू ख़तरे में हैं,
किसी को लगता मुसलमान ख़तरे में हैं,
धर्म का चश्मा उतार कर देखो यारों,
पता चलेगा हमारा हिंदुस्तान ख़तरे में हैं.

फोटो सौजन्य से सोशल मीडिया

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