मंदिर घूमा,मस्जिद घूमा…सत्ता का सुख मिला नहीं।

 

संवाद स्पेशल (वर्णिता वाजपेयी)

आख़िर क्यों मन्दिर नीति और जनेऊ धारण करके भी काँग्रेस लोकतंत्र बचाने में विफ़ल रही।

 

गुजरात और हिमाचल विधानसभा के परिणाम को देखकर आपको अबतक के अंदाज़ा लग गया होगा कि कमल फ़िर खिल चुका है। नतीजों का जो सिलसिला सुबह से लगातार चल रहा था उससे एक बात तो साफ़ है कि ई.वी.एम की छीछालेदर नहीं कि जाएगी। और अगर ई.वी.एम पर लांछन लगे भी तो वो हज़म नहीं होंगे। लगातार हार का स्वाद चखती काँग्रेस ने फ़िर से ये सिद्ध कर दिया कि सही मायने में वो ‘रत्ती भर विपक्ष’ के टैग को अपना चुकी है। नव नियुक्त काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ-साथ गुजरात के तीन युवा नेता अल्पेश,जिग्नेश और हार्दिक पटेल किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। गुजरात से लेकर मीडिया तक कि नज़र इन तीनों पर टिकी थी। जहाँ प्रधानमंत्री की रैलियों में भीड़ न के बराबर होने का दावा किया गया वहीं हार्दिक की रैलियों में जमा लोगों का हुजूम ये दर्शाता है कि हार्दिक के फ़ैक्टर ने काँग्रेस को बड़ी राहत दी। जहाँ भाजपा के 150 सीट आने के दावे एग्जिट पोल में किए जा रहे थे सही मायने में उसे 105-108 के आसपास लाने वाले तीनो युवा नेता बेहतरीन नायक साबित हुए। पर फ़िर भी काँग्रेस की दोनों जगह हार एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। जो कहती है कि लोकतंत्र का सही अर्थ काँग्रेस और विपक्ष को समझना होगा।

 

2014 में नरेंद्र मोदी ने जब प्रधानमंत्री का पद संभाला तब काँग्रेस ने गुजरात में वो पकड़ नहीं बनाई जो उसे बनानी चाहिए थी। ज़मीनी स्तर पर हार्दिक,अल्पेश और जिग्नेश के अलावा काँग्रेस को भी अपना अस्तित्व वहां स्थापित करना चाहिए था। अब परीक्षा से एक रात पहले पढ़ने वाला विद्यार्थी पास तो हो सकता है परंतु टॉप नहीं कर सकता। यही फॉर्मूला काँग्रेस पर भी लागू होता है। जहां मोदी 5 मंदिर के दर्शन करते हैं वही राहुल गांधी 27 मंदिर के दर्शन करने के बावजूद उद्धार नहीं पाते। ये देखकर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि जनता भाजपा से खफ़ा हो या न हो परन्तु नरेंद्र मोदी का जादू अभी बरकरार है। 2012 विधानसभा चुनाव में भाजपा (115) के सामने काँग्रेस 61 सीटे लाने में सक्षम थी। तो आज भी काँग्रेस 79 (लेख लिखे गए समय तक) सीटों तक सीमित दिख रही है।

 

इस बात से काँग्रेस को सांत्वना तो नहीं पर सीख ज़रूर लेनी चाहिए। जब देश के 29 राज्यों में से 19 में भाजपा की सरकार है, तो ऐसे में विपक्ष को सांत्वना नहीं सीखने की ज़रूरत है। आख़िर क्यों जनेऊ धारण करने के बावजूद भी राहुल गांधी को विफलता का मुंह देखना पड़ रहा है। आख़िर क्यों मंदिर-मंदिर की दौड़ लगाने वाले राहुल का उद्धार स्वयं द्वारिकाधीश भी नहीं कर पाए। एक चुनाव के लिए 27 मंदिर के दौरे। सोमनाथ से लेकर द्वारिकाधीश, मन्दिरनीति या हिंदुत्व की राजनीति किसी में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई। फ़िर भी राहुल के हाथ लगी तो बस विफलता। इसमें कोई दो राय नहीं कि काँग्रेस की छवि पहले से ही हिन्दू विरोधी रही है। इस छवि को तोड़ने के लिए राहुल गांधी ने जमकर प्रयास भी किए। पर ऐसे बहुत से बयान और घटनाएं काँग्रेस पार्टी को हिन्दू विरोधी नीति पर चलने वाली पार्टी के रूप में साबित करते हैं। फ़िर चाहे कपिल सिब्बल का श्री राम कि आस्था की तुलना ट्रिपल तलाक़ से करना हो या सरकार के कानून के विरोध प्रदर्शन में काँग्रेस कार्यकर्ता का सरेआम गाय काटना। अब ऐसे में कहां कोई जनेऊ आपका रक्षण कर पाएगा।

 

इतिहास की ओर रुख़ करें तो चाहे सोमनाथ मंदिर का विरोध हो या शाह बनो केस में लिया गया गलत फ़ैसला। काँग्रेस की छवि दर्शाने का काम आसानी से करते हैं। वहीं समान नागरिक सहिंता कानून ना लाकर हिन्दू कोड बिल लाना भी इस बात का प्रमाण ख़ुद ब ख़ुद देता है, कि वोट की ख़ातिर हमेशा से एक विशेष समुदाय का तुष्टिकरण किया गया और अब वही गुजरात चुनाव से पहले जनेऊ और शिवभक्त बनकर किया जा रहा था। जो काँग्रेस 2007 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहती है कि राम,सीता,और हनुमान सब काल्पनिक किरदार हैं और रामसेतु का कोई धार्मिक महत्त्व नहीं है। तो उसी पार्टी के अध्यक्ष अगर जनेऊ पहन मंदिर-मंदिर की दौड़ लगाएंगे तो उन्हें श्री राम कैसे बचाएंगे। हिन्दू आतंकवाद का शब्द गढ़ने वाली काँग्रेस जब जनेऊ धारी हिन्दू बन जाएगी तो सफलता कैसे पाएगी। इतना ही नहीं राहुल गांधी ने ख़ुद भी अपने ‘मंदिर जाना और छेड़खानी ‘ करने वाले बयान से काँग्रेस की छीछालेदार करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। तो ऐसे में चाहे जितने मंदिर जाइए। कृष्ण को पूजिए या श्री राम को, सोमनाथ जाइए या द्वारिकाधीश सत्ता का सुख मिलना ज़रा मुश्किल है।

 

 

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