सरकारी कर्मचारी भूल चुके हैं मानवता इसीलिए उनकी बज रही है बैंड !

संवाद न्यूज़ स्पेशल रिपोर्ट ( हिमांशु राय )

मन कभी कभी इस बात को कहने पर मजबूर हो जाता है कि हमारे देश में इंसान कम और भेंड़ों की संख्या ज्यादा है। आज के इस युग का इंसान क्या कर रहा है उसे खुद नहीं पता होता है। वो क्यों कर रहा है ये भी उसे पता नहीं होता। सिर्फ एक बिल्ला लग जाता है कि “का करें साहब हम तो मजबूर हैं”।

दरअसल ये मजबूर शब्द वहीं से जन्म ले लेता है जब मनुष्य कोई बड़ी गलती कर बैठता है और जीवन भर उसके परिणाम को भुगतना पड़ता है। जैसे यदि किसी ने एक बार चोरी कर ली तो पुलिस बार बार उसे उठाती रहती है। उसे ये हमेशा शंका बनी रहती है कि हो न हो चोरी इसी ने की होगी। अभी कुछ दिन पहले प्रयागराज के प्रसिद्ध अस्पताल स्वरूप रानी में डॉक्टरों से अभद्रता करने पर डॉक्टरों ने हड़ताल शुरू कर दी। धीरे धीरे ये मामला बढ़ता ही गया। ये आग जब अलीगढ़ पहुंची तो डॉक्टरों ने सातवें वेतन आयोग का मुद्दा उठा दिया और हड़ताल शुरू कर दी।

यानि मामला शुरू हुआ कहीं और लेकिन इस हड़ताल की गंगा में कितना हांथ धो लिया जाए ये सबने प्रयास किया। जिला प्रशासन भी मूक दर्शक बनकर सब कुछ देखता रहा। स्वरूप रानी अस्पताल के डॉक्टरों का कहना था कि हमसे अभद्रता की जाती है। हमें सुरक्षा नहीं मिली तो हम इलाज नहीं करेंगे। जब मैंने ये बात सुनी तो मुझे क्रोध आया। क्योंकि यही स्वरूप रानी अस्पताल है जहां सुविधाओं के अभाव में आए दिन लोगों की जान चली जाती है। मरने वाले को कितनी सुरक्षा मिलती है? इस अस्पताल में असुविधाओं का बोलबाला है।

सिर्फ स्वरूप रानी अस्पताल ही नहीं इसी तरह जिला महिला अस्पताल प्रयागराज का भी कुछ यही हाल है। मेरे मन में सिर्फ एक ही सवाल बिजली की तरह दौड़ रहा है कि इन डॉक्टरों को सुरक्षा चाहिए लेकिन जिन मरीजों को ये डॉक्टर अभद्र व्यवहार करते हुए अपने चैम्बर से बाहर निकाल देते हैं उन मरीजों को सुरक्षा कौन देगा? इन डॉक्टरों को अपना वेतन बढ़ाने के लिए हड़ताल करने की पड़ी है और वहीं दूसरी तरफ इलाज के अभाव में लोग दम तोड़ रहे हैं। उनकी सुरक्षा कौन करेगा?

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Doctor beats Patient in Rajasthan (Photo Source- Google)

 

दरअसल इन डॉक्टरों को सुरक्षा इसलिए चाहिए की जब इनकी गलतियों को पकड़कर तिमारदार इन पर बरसें तो ये अपनी सुरक्षा के लिए सिक्योरिटी गार्ड को आवाज देकर तिमारदार को धक्के देकर बाहर निकलवा सकें। ये कोई बनावटी बात नहीं । जब जनरल वार्ड में कोई मरीज दर्द से कराह रहा होता है और तिमारदार स्टाफ रूम के बाहर खड़े होकर ये बोलता है कि मैम हमारा पेशेंट दर्द से तड़प रहा है तो मैम साहिबा का कहना रहता है कि चलो आ रहे हैं अब क्या सर पे चढ़ जाओगे, भागो यहां से। तिमारदार बार बार मरीज की तड़प देखकर मैम साहिबा के चक्कर लगाता रहता है और मैम साहिबा के नखरे सातवें आसमान पर दिखते हैं।

जब स्थिति बस के बाहर हो जाती है तो साहिबा एक फरमान जारी कर देती हैं कि जल्दी से इन्हें यहां से दूसरे अस्पताल में ले जाओ। ये सिर्फ एक सरकारी अस्पताल का नहीं बल्की सभी सरकारी अस्पतालों की कहानी है। कभी कभी स्थिति ये होती है कि रात के समय यदि डॉक्टर की जरूरत पड़ती है तो पता चलता है कि डॉक्टर सवेरे आएंगे और वही देखेंगे।

 

यानि रात भर मरीज तड़पता रहता है। कभी कभी तो साहब कंपाउंडर से ही काम चल जाता है। जब इन सरकारी अस्पतालों में लोग अपने मरीज को लेकर पहुंचते हैं तो उनसे प्यार से बोला जाता है कि काउंटर पर पैसा जमा कर दीजिए और ध्यान से माइक की आवाज सुनकर दवा ले आते रहिएगा। बेचारा तिमारदार करे भी तो क्या करे। उसे तो करना ही है। जब मरीज भर्ती हो जाता है तो सिक्योरिटी वालों की गुंडई शुरू हो जाती है। बोलते हैं ऐ वहां मत बैठो। ऐ यहां से बाहर निकलो। अरे साहब जरा सोचिए कि जो मरीज बेड पर तड़प रहा है उसके परिजनों के साथ कितनी अभद्रता होती है। डॉक्टर यदि गुस्से में भी बोलता है तो परिजनों को सहना पड़ता है। क्योंकि वो मरीज को लेकर मजबूर है।

Special Report On Hospital
Doctor Protest Photo Source- Google

कुछ यही हाल बीएचयू के इमरजेंसी वार्ड का भी है। जरा अब बताइए कि इन परिजनों को कौन सी सुरक्षा दी जाती है जब ये डॉक्टर उनसे बदतमीजी करते हैं। शायद यही वजह है कि लोग प्राइवेट अस्पतालों में भागने को मजबूर होते हैं। क्योंकि लोगों को ये पता होता है कि वहां पैसा भले ही थोड़ा ज्यादा लगेगा लेकिन वहां साफ सफाई से लेकर लोगों की सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान होता है। उनसे कोई डॉक्टर अभद्र व्यवहार भी नहीं करता। ये हाल सिर्फ अस्पतालों का ही नहीं है बल्की सच्चाई ये है कि जितने भी सरकारी कर्मचारी हैं वो सभी सरकारी नौकरी को अपनी पुस्तैनी इमारत समझने लगते हैं और खुद को एक नवाब से कम नहीं समझते।

यदि इस बात को कुछ लोगों से कहा जाए तो उनका साफ तौर पर ये कहना होगा कि नवाब क्यों न समझें। इतनी मेहनत किए हैं वहां तक पहुंचने में। तो मेरा यही मानना है कि जनता को परेशान करने में जो मेहनत लगाई गई हो वैसी मेहनत भाड़ में जाए। चाहे बैंक हो, अस्पताल हो, कॉलेज हो या अन्य कोई भी सरकारी संस्था हो हर जगह यही भ्रष्ट लोगों की नियुक्ति की जाती है। इसीलिए जनता परेशान रहती है। जब सीएम का दौरा होता है तो यही भ्रष्ट लोग और भ्रष्ट जिला प्रशासन खुद को शरीफ और सज्जन दिखाने के लिए रातों रात उस स्थान को चमकाने लगता है। लेकिन जैसे ही सीएम वापस चले जाते हैं फिर शुरू हो जाता है वही भ्रष्टाचार का गंदा खेल।


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