पत्रकारों से बात करने की तमीज भूल रहे नेता और पुलिसकर्मी !

पत्रकार हिमांशु राय का विश्लेषण

आज का मनुष्य घमंड और अहंकार में इतना चूर है कि उसे खुद के सामने कोई दिखाई ही नहीं देता है। जनता में लोग गुंडों से कम लेकिन पुलिस और नेताओं से ज्यादा दहशत में जीने लगे हैं। जबकि इन दोनों को जनता की सुरक्षा के लिए चुना गया है। लेकिन ये दोनों राक्षसी रूप दिखा रहे हैं। जी हां! ये महज बातों की पतंग नहीं उड़ा रहा हूं यही सच्चाई है।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है मीडिया। जब इन राजनेताओं को कम समय के अंदर जनता को बेवकूफ बनाकर अपना वोट बैंक बनाना होता है तो ये मीडिया का ही सहारा लेते हैं। जब एक पुलिस वाले को अपनी तारीफ के पुलिंदे बांधने होते हैं तो वो मीडिया का ही सहारा लेता है। लेकिन एक ऐसा वक्त आता है जब यही नेता पत्रकार की औकात पूछने से पहले ये भूल जाते हैं कि यदि यही पत्रकार और जनता नेता जी का समर्थन न करती तो उनकी क्या औकात होती। जिस कुर्सी पर बैठकर कुर्सी का धौंस दिखा रहे हैं वो कुर्सी है तो सिर्फ जनता और मीडिया की बदौलत।

पत्रकारों के साथ आए दिन कभी पुलिसवाला बदतमीजी करता है तो कभी ये नेता करते हैं। एक ज्वलंत मामला सामने आया है कि बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का एक वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। जिसमें कैलाश अपने विधायक सुपुत्र और आरोपी आकाश विजयवर्गीय को लेकर एक पूछे गए सवाल पर भड़क उठे हैं। दरअसल आकाश विजयवर्गीय ने मध्य प्रदेश के इंदौर में नगर निगम अधिकारी पर खुलेआम बैट से हमला बोल दिया। जिसके बाद कोर्ट ने उनको 11 जुलाई तक के लिए जेल भेज दिया है।

इस घटना के बाद एक चैनल ने कैलाश विजयवर्गीय से उनके बेटे की गुंडागर्दी पर सवाल कर दिया और कहा कि आपको इसकी निंदा करनी चाहिए। इतने पर ही कैलाश विजयवर्गीय भड़क उठे और पत्रकार से बोले कि तुम होते कौन हो विधायक पर सवाल करने वाले? तुम्हारी हैसियत क्या है? तुम्हारी औकात क्या है? इस तरह अभद्रता का परिचय देते हुए कैलाश विजयवर्गीय ने अपने बेटे की करतूतों पर पर्दा डालना चाहा।

लेकिन उनका ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। इसके बाद लोग उनकी आलोचना करने लगे। आखिर ये लोग खुद को कितना बड़ा नवाब समझने लगते हैं। जब तक चुनाव का समय रहता है यही लोग भीगी बिल्ली बनकर जनता के सामने वोटों की भीख मांगते फिरते हैं और कुर्सी पकड़ते ही उसे पुस्तैनी विरासत समझ बैठते हैं। आखिर कब होगा सुधार? पत्रकारों की औकात पूछने वाले ये लोग क्यों भूल जाते हैं कि यदि मीडिया न होती तो इनकी क्या औकात होती?

 


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